साँझी लक्ष्मी
मथुरा-वृंदावन की साँझी की तरह काटी गई सफ़ेद काग़ज़ी जाली, रानी गुलाबी पर: लक्ष्मी के साँचे पर रंग बुरका जाता है, और साँचा उठते ही वे रंग से बनी दिखती हैं।
स्नेहपत्रिका के आख़िरी दृश्य के साथ मुफ़्त · बिना उसके ₹99
यह वीडियो निमंत्रण बनाएँइस शैली के बारे में
साँझी काग़ज़ के साँचे काटने की कला है, जिसे ब्रज में मथुरा और वृंदावन के मंदिरों और घरों ने जीवित रखा है। परंपरा कहती है कि सबसे पहले राधा ने साँझी बनाई थी, कृष्ण को रिझाने के लिए धरती पर फूल सजाकर, और वृंदावन के मंदिरों में आज भी हर साल नवरात्र से पहले के पखवाड़े में साँझी बनाई जाती है। साँचे काग़ज़ से हाथ से, बारीक कैंची से काटे जाते हैं, जिनमें बग़ीचे, पक्षी, मंडप और कृष्ण लीला के दृश्य जाली की तरह उभरते हैं। साँचे को फ़र्श या किसी चिकनी सतह पर रखकर उसके छेदों पर रंगीन चूर्ण बुरका जाता है, फिर काग़ज़ उठा लिया जाता है, और चित्र रंग में पीछे रह जाता है।
इस वीडियो में साँचे रानी गुलाबी काग़ज़ पर रखी सफ़ेद काग़ज़ी जाली हैं। लक्ष्मी का साँचा रखा जाता है, उस पर रंग बुरका जाता है और काग़ज़ उठते ही वे रंग से बनी दिखती हैं; आपकी पारिवारिक फ़ोटो जाली के चौखटे में है, और न्योते के साथ दीये और मोर भी कटे हुए हैं। यह जाली इस वीडियो के लिए साँझी शैली में बनाई गई है; इसे मथुरा-वृंदावन के साँझी कलाकारों ने नहीं काटा है।
और वीडियो निमंत्रण
- पिछवाई कमल सरोवर
- कंदील की रात
- वारली रात
- सुनहरा वर्क़, नीली रात
- रंगोली आँगन
- मधुबनी
- कच्छी शीशा कढ़ाई
- रेट्रो पोस्टर
- सुनहरा तंजौर
- मिट्टी की दिवाली
- पैठणी फराल
- फराल की रसोई
- चित्रकथी लक्ष्मी पूजन
- गंजीफ़ा लक्ष्मी
- रोगन जीवन-वृक्ष
- जामनगरी बांधनी
- माता नी पछेड़ी
- संखेड़ा दुकान
- वाड़े की भोर
- संस्कार भारती रंगोली
- दिवाली का किला
- सोसाइटी के कंदील
- पिथोरा के घोड़े
- पाटन पटोला
- लिप्पन माटी-शीशा
- अहमदाबाद की पोल
- बंबई आर्ट डेको
- परतदार पेपर-कट
- लिनोकट भोज
- शिवकाशी माचिस
- फड़ लक्ष्मी पूजन
- कांगड़ा दिवाली मिलन
- किशनगढ़ गोवर्धन
- ऐपण भाई दूज
- सोहराई धनतेरस